top of page

आपको यहाँ सीकर के प्रसिद्ध मंदिर के बारे में बताया जा रहा है

455fc55c-88c8-4d5a-a3cb-13f369dd354e.jpeg

खाटूश्यामजी मंदिर

खाटूश्यामजी, सीकर, राजस्थान

123-456-7890

  • Facebook
  • Twitter
  • LinkedIn

खाटू श्याम जी मंदिर का निर्माण मूल रूप से 1027 ई. में रूपसिंह चौहान ने करवाया था. बाद में, 1720 ई. में दीवान अभय सिंह ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया. इस समय मंदिर ने अपना वर्तमान रूप लिया और मूर्ति को गर्भगृह में स्थापित किया गया.खाटू श्याम मंदिर की मुख्य विशेषता यह है कि इसे कलयुग में भगवान कृष्ण का अवतार माना जाता है और यह हारे का सहारा है। यह मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में स्थित है और यहां प्रतिदिन लाखों भक्त दर्शन के लिए आते हैं।खाटू श्याम मंदिर की अन्य विशेषताएं:वास्तुकला:मंदिर सफेद संगमरमर और चूने से बना है और इसकी दीवारों पर पौराणिक दृश्यों के चित्र बने हुए हैं. श्याम कुंड:मंदिर के पास श्याम कुंड है, जहां बाबा श्याम का शीश प्राप्त हुआ था। इस कुंड के पानी को पवित्र माना जाता है और इसमें स्नान करने से पाप धुल जाते हैं. श्याम बगीची:मंदिर के पास एक सुंदर बगीचा है, जो देवता को समर्पित करने के लिए फूलों का स्रोत है. मनोकामना पूर्ति:मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से खाटू श्याम की पूजा करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. हारे का सहारा:खाटू श्याम को हारे का सहारा कहा जाता है, इसलिए जो लोग जीवन में निराश या परेशान होते हैं, वे यहां आते हैं और बाबा श्याम से अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं. खाटू श्याम मंदिर का इतिहास:खाटू श्याम जी का बचपन का नाम बर्बरीक था और उनका संबंध महाभारत से है. भगवान कृष्ण ने बर्बरीक को कलियुग में श्याम नाम से पूजने का वरदान दिया था. खाटू गांव के राजा रूपसिंह चौहान को सपने में मंदिर बनाने और बर्बरीक का शीश स्थापित करने का आदेश मिला था. मंदिर में बर्बरीक का शीश स्थापित करने के बाद से, यह एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान बन गया है.

R. K. VERMA 

7375070369

हर्षनाथ मंदिर
सीकर राजस्थान

हर्षनाथ मंदिर, भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन हिंदू मंदिर है, जो राजस्थान के सीकर जिले में स्थित है। इसे 973 ई. में भवरक्त द्वारा निर्मित माना जाता है, जो चाहमान राजा विग्रहराज द्वितीय के शासनकाल में था। यह मंदिर हर्ष पर्वत पर स्थित है, जो अरावली पहाड़ियों का हिस्सा है.

अधिक विस्तृत जानकारी:

निर्माण:

हर्षनाथ मंदिर का निर्माण 973 ई. में हुआ था, जो चाहमान राजा विग्रहराज द्वितीय के शासनकाल में था। मंदिर का निर्माण भवरक्त द्वारा किया गया था.

स्थान:

यह मंदिर हर्ष पर्वत पर स्थित है, जो अरावली पहाड़ियों का हिस्सा है। मंदिर सीकर जिले में स्थित है.

स्थापत्य:

मंदिर उत्तर भारतीय हिंदू मंदिर स्थापत्य शैली में बना है। प्रार्थना कक्ष और स्तंभों पर स्थानीय देवी-देवताओं की छवियां उत्कीर्ण हैं.

इतिहास:

मंदिर के बारे में कई शिलालेख मौजूद हैं जो इसकी प्राचीनता को दर्शाते हैं। एक शिलालेख में मंदिर के निर्माण का उल्लेख किया गया है जो 1030 विक्रम संवत (956 ई.) का है, जो आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी, सोमवार को पूरा हुआ था.

महत्व:

हर्षनाथ मंदिर स्थानीय लोगों, भक्तों और तीर्थयात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। मंदिर में महाशिवरात्रि का उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है.

पुनर्निर्माण:

1718 में, शिव सिंह ने पुराने मंदिर के खंडहरों का उपयोग करके एक नया मंदिर बनवाया था.

अन्य विशेषताएं:

मंदिर से आसपास के क्षेत्र का शानदार दृश्य दिखाई देता है.भगवान शिव ने इस पर्वत पर इन राक्षसों का संहार किया था। इससे देवताओं में अपार हर्ष हुआ और उन्होंने शंकर की आराधना व स्तुति की। इस प्रकार इस पहाड़ को हर्ष पर्वत एवं भगवान शंकर को हर्षनाथ कहा जाने लगा।

R.K. VERMA 

7375070369

  • Facebook
  • Twitter
  • LinkedIn
6d37a600-bd03-4c7b-8c79-37e31377623a.jpeg
93b6d0d4-459e-437e-b747-1a9eb4b90a32.jpeg

सालासर मंदिर

चूरू,राजस्थान

J.K.  SINGH

9887473164

123-456-7890

  • Facebook
  • Twitter
  • LinkedIn

सालासर बालाजी मंदिर की स्थापना के पीछे कई मान्यताएं और कहानियां जुड़ी हुई हैं। एक प्रमुख कहानी नागौर जिले के असोटा गांव में एक किसान के खेत से बालाजी की मूर्ति मिलने से संबंधित है. इस मूर्ति को बाद में सालासर में स्थापित किया गया और यहां मंदिर का निर्माण हुआ. विस्तृत इतिहास:नागौर के असोटा से मूर्ति की खोज:एक किसान, जो नागौर जिले के असोटा गांव में खेत जोत रहा था, उसका हल किसी पत्थर से टकरा गया. उसने देखा कि वह एक पत्थर है जिस पर बालाजी की छवि बनी हुई है. सपना और मूर्ति का स्थानांतरण:कहा जाता है कि असोटा के ठाकुर को सपने में बालाजी ने निर्देश दिया कि मूर्ति को सालासर ले जाकर स्थापित किया जाए. एक अन्य किंवदंती के अनुसार, मोहनदास महाराज को भी बालाजी ने सपने में दर्शन दिए और उन्हें मूर्ति को सालासर ले जाने का निर्देश दिया. सालासर में स्थापना:मूर्ति को सालासर ले जाया गया और विक्रम संवत 1811 श्रावण शुक्ला नवमी को स्थापित किया गया. मोहनदास महाराज का योगदान:मोहनदास महाराज एक प्रसिद्ध संत थे जिन्होंने बालाजी की भक्ति में अपना जीवन समर्पित किया था. उन्होंने मंदिर के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. मंदिर का विकास:मंदिर के आसपास के क्षेत्र को विकसित करने और भक्तों को सुविधाएं प्रदान करने के लिए हनुमान सेवा समिति की स्थापना की गई. मन्नतें और मान्यताएं:सालासर बालाजी को अपनी मन्नतों को पूरा करने के लिए जाना जाता है और भक्त यहां नारियल बांधते हैं, जो उनकी मनोकामना पूर्ण होने का प्रतीक है. सालासर बालाजी मंदिर एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है जो भारत भर के भक्तों के लिए एक प्रेरणा है.सालासर बालाजी मंदिर भगवान हनुमान के भक्तों के लिए एक धार्मिक स्थल है। यह राजस्थान के चुरू जिले में जयपुर-बीकानेर राजमार्ग पर स्थित है।[1] [2]वर्ष भर में असंख्य भारतीय भक्त दर्शन के लिए सालासर धाम जाते हैं। [3]हर वर्ष चैत्र पूर्णिमा और आश्विन पूर्णिमा पर बड़े मेलों का आयोजन किया जाता है। भारत में यह एकमात्र बालाजी का मंदिर है जिसमे बालाजी के दाढ़ी और मूँछ है। सालासर धाम में आने वाले सभी यात्रियों की सुविधा व धाम का विकास “श्री बालाजी मंदिर” के माध्यम से “श्री हनुमान सेवा समिति” द्वारा समुचित रूप से किया जाता है। यहाँ रहने के लिए कई धर्मशालाएँ और खाने-पीने के लिए कई जलपान-गृह (रेस्तराँ) हैं। श्री सालासर बालाजी मंदिर सालासर कस्बे के ठीक मध्य में स्थित है। यहाँ की मान्यता है की मात्र नारियल बांधने से बालाजी महाराज सभी इच्छाओं को पूरी करते है।

श्री महालक्ष्मी मंदिर
अलोदा सीकर राजस्थान

यह मंदिर अपनी मान्यताओं की वजह से हमेशा चर्चा में बना रहता है. कहा जाता है कि स्वयं लक्ष्मी माता ने राजा के सपने में आकर अपना अलग मंदिर बनाने की इच्छा जाहिर की थी. इसके बाद राजा ने दूसरी जगह मां लक्ष्मी का मंदिर बनवाकर उसमें मूर्ति स्थापित की थी महालक्ष्मी मनोकामना मंदिर पर भक्तों की बहुत आस्था है। भक्तों का कहना है कि 5 साल पहले मां खुद इस मंदिर में आई थी। उसके बाद से ही मूर्ति के सामने खुद-ब-खुद मां के पैर बन गए थे। तब से दूर-दूर से भक्त आने लगे। मां से मनोकामना पूरी होने का मन्नत का धागा भी बांधा जाने लगा। आज दीवाली पर हम आपको लक्ष्मी माता मंदिर के प्रति भक्तों की आस्था और इसके बनने की रोचक कहानी के बारे में बताते हैं। दूर-दूर से भक्त दर्शन करने आते माता का ये मंदिर सीकर से 35 किलोमीटर दूर डूकियां गांव में है। मंदिर के बाहर पार्क में पेड़-पौधे लगे हुए है। भक्तों के लिए एक विश्राम गृह भी बनाया गया है। अब मंदिर परिसर में वृंदावन के प्रेम मंदिर की तर्ज पर राधा-कृष्ण का मंदिर भी बनाया जा रहा है। मंदिर की दूरी खाटूश्यामजी से 8 और जीणमाता मंदिर से 15 किलोमीटर है। 5 साल पहले बने मंदिर के लिए आस्था दूर-दूर तक है। खाटूश्यामजी और जीणमाता मंदिर आने वाले भक्त लक्ष्मी मां के दर्शन करने जरूर आते है।

 

दीवाली पर खुद मंदिर के पट हो गए मंदिर के पुजारी सतीश ने बताया कि 7 नवंबर 2018 को दीवाली के दर्शनों के लिए रात को मंदिर के पट खुले छोड़ दिए थे। देर रात मंदिर के पट अंदर से अपने आप बंद हो गया। पट बंद होने की सूचना आस-पास के लोगों तक पहुंची तो बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ जमा हो गई। गेट खोलने की कोशिश की, लेकिन नहीं खुला। तब भक्तों ने मिलकर गेट को तोड़ दिया। गेट खोलने पर मंदिर में स्थित मूर्ति के सामने मेहंदी और चंदन लगे पैर उभरे हुए दिखाई दिए। तब से मान्यता हो गई कि दीवाली पर मां लक्ष्मी मंदिर में आ गईं। लक्ष्मीजी का मंदिर, जिसके पट अपने आप बंद हो गए:लोगों की छाया से बचाने को खुदाई में मिली मूर्ति को बड़ी मूर्ति में छुपाया

सीकर3 वर्ष पहलेलेखक: सतवीर सिंह

 

महालक्ष्मी मनोकामना मंदिर सीकर से 35 किमी दूर डूकिया गांव में है। खाटूश्यामजी और जीणमाता आने वाले भक्त मां लक्ष्मी के दर्शन करने भी आते है।

महालक्ष्मी मनोकामना मंदिर सीकर से 35 किमी दूर डूकिया गांव में है। खाटूश्यामजी और जीणमाता आने वाले भक्त मां लक्ष्मी के दर्शन करने भी आते है।

मां लक्ष्मी का एक मंदिर ऐसा, जिसके पट दीवाली पर अपने आप बंद हो गए थे। गेट को तोड़ने पर मेहंदी और चंदन से बने पैर नजर आए थे। इस मंदिर की मूर्ति भी खुदाई में मिली थी। मां की उस मूर्ति को बड़ी मूर्ति के अंदर छुपाकर प्राण-प्रतिष्ठा की गई थी।

 

 

महालक्ष्मी मनोकामना मंदिर पर भक्तों की बहुत आस्था है। भक्तों का कहना है कि 5 साल पहले मां खुद इस मंदिर में आई थी। उसके बाद से ही मूर्ति के सामने खुद-ब-खुद मां के पैर बन गए थे। तब से दूर-दूर से भक्त आने लगे। मां से मनोकामना पूरी होने का मन्नत का धागा भी बांधा जाने लगा। आज दीवाली पर हम आपको लक्ष्मी माता मंदिर के प्रति भक्तों की आस्था और इसके बनने की रोचक कहानी के बारे में बताते हैं।

 

दिल्ली के भक्त ने अपने रहने के लिए जमीन खरीदी थी। जमीन की खुदाई में मां की मूर्ति मिली थी। इसके बाद मां लक्ष्मी का मंदिर करीब 5 साल पहले बनवाया गया था। - Dainik Bhaskar

दिल्ली के भक्त ने अपने रहने के लिए जमीन खरीदी थी। जमीन की खुदाई में मां की मूर्ति मिली थी। इसके बाद मां लक्ष्मी का मंदिर करीब 5 साल पहले बनवाया गया था।

दूर-दूर से भक्त दर्शन करने आते माता का ये मंदिर सीकर से 35 किलोमीटर दूर डूकियां गांव में है। मंदिर के बाहर पार्क में पेड़-पौधे लगे हुए है। भक्तों के लिए एक विश्राम गृह भी बनाया गया है। अब मंदिर परिसर में वृंदावन के प्रेम मंदिर की तर्ज पर राधा-कृष्ण का मंदिर भी बनाया जा रहा है। मंदिर की दूरी खाटूश्यामजी से 8 और जीणमाता मंदिर से 15 किलोमीटर है। 5 साल पहले बने मंदिर के लिए आस्था दूर-दूर तक है। खाटूश्यामजी और जीणमाता मंदिर आने वाले भक्त लक्ष्मी मां के दर्शन करने जरूर आते है।

 

दीवाली पर खुद मंदिर के पट हो गए मंदिर के पुजारी सतीश ने बताया कि 7 नवंबर 2018 को दीवाली के दर्शनों के लिए रात को मंदिर के पट खुले छोड़ दिए थे। देर रात मंदिर के पट अंदर से अपने आप बंद हो गया। पट बंद होने की सूचना आस-पास के लोगों तक पहुंची तो बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ जमा हो गई। गेट खोलने की कोशिश की, लेकिन नहीं खुला। तब भक्तों ने मिलकर गेट को तोड़ दिया। गेट खोलने पर मंदिर में स्थित मूर्ति के सामने मेहंदी और चंदन लगे पैर उभरे हुए दिखाई दिए। तब से मान्यता हो गई कि दीवाली पर मां लक्ष्मी मंदिर में आ गईं।

 

महालक्ष्मी मनोकामना मंदिर में हर दीवाली पर मेला भरता है। इस दिन दूर-दूर से भक्त आकर मां के दर्शन कर मन्नत का धागा बांधकर जाते हैं। - Dainik Bhaskar

महालक्ष्मी मनोकामना मंदिर में हर दीवाली पर मेला भरता है। इस दिन दूर-दूर से भक्त आकर मां के दर्शन कर मन्नत का धागा बांधकर जाते हैं।

खुदाई में मिली अष्टधातु की मूर्ति पुजारी ने बताया कि मंदिर का निर्माण दिल्ली के श्याम भक्त नरेश नागर ने करवाया था। नरेश नागर खाटूश्यामजी के भक्त है और दर्शनों के लिए हर बार आते है। उन्होंने रुकने के लिए खाटूश्यामजी के पास डूकिया गांव में 150 बीघा जमीन खरीदी थी। दर्शन के लिए खाटू आने पर रुकने के लिए जमीन पर घर बनाना शुरू किया था। उन्होंने दो कमरों को बनवाना शुरू किया। इस दौरान खुदाई में एक अष्टधातु की मूर्ति मिली।

 

नारायण दास जी महाराज के कहने पर भक्त ने बनवाया मंदिर श्याम भक्त मूर्ति निकलने के बाद दिल्ली जा रहे थे। बीच रास्ते में त्रिवेणी धाम के महंत नारायण दास महाराज का आशीर्वाद लेने पहुंच गए। उन्होंने महाराज को मूर्ति दिखाई। तब नारायण दास जी ने मूर्ति मिलने वाली जगह महालक्ष्मी का मंदिर बनाने की बात कही। महाराज के कहने पर श्याम भक्त वापस मूर्ति को लेकर उसी जगह आ गए और मंदिर बनाने की शुरुआत की। 14 जनवरी 2018 को मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। मंदिर 17 अक्टूबर 2018 तक बनकर तैयार हो गया। मंदिर बनाने में करीब डेढ़-दो करोड़ रुपए लगे। दो साल पहले एक वर्ल्ड रिकॉर्ड बना। एक साथ 7.7 करोड़ दर्शकों ने दूरदर्शन पर एक साथ रामानंद सागर की रामायण देखी। त्रेता युग में महर्षि वाल्मिकी द्वारा लिखी गई रामायण को किसी ने चावल के दानों पर लिखा तो किसी ने पत्थरों पर उकेरा।

 

लेकिन एक रामायण ऐसी है जो कागज पर नहीं, हवेली की छत और दीवारों पर लिखी गई है। वो भी किसी आम स्याही या रंग से नहीं बल्कि सोने की स्याही से। ये छत जिस 200 साल पुरानी हवेली में मौजूद है, उसकी चमक आज भी बरकरार है। इसे 'सोने की हवेली' कहा जाता है।

 

ये जगह है झुझुनूं जिले के गांव महनसर में। इस अद्भुत कारीगरी का पता लगाने भास्कर टीम गांव महनसर पहुंची।

R.K. VERMA​

7375070369

  • Facebook
  • Twitter
  • LinkedIn
c936f447-27f9-47bc-a23e-b4afb1456aad.jpeg
bottom of page